Wednesday, April 7, 2010

'सुकून-ए-काज़ल..'

...

"रुस्वाइयां तैरती थीं..
साँसों से टकराती थीं..
राहें उलझतीं थीं..
निगाहों से शर्मातीं थीं..

खामोश है..
मंज़र सारा..


मुद्दत हुई..
आईना नहीं देखा..
सच है..
सुकून-ए-काज़ल..
नहीं देखा..!"

...

6 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

Jandunia said...

बहुत सुंदर रचना।

Shekhar kumawat said...

good

bahut khub


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

संजय भास्कर said...

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद जनदुनिया जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद शेखर कुमावत जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!