Friday, October 29, 2010

'काविश-ए-मौत..'

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"जिंदगानी लबों पे..
रखी है..
बुझ जाए..
रूह की आँधी..
गर..
समझ लेना..
इम्तिहाँ जीत आया..
काविश-ए-मौत..!!'

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Monday, October 25, 2010

'सियासी मक्कारी..'

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"सवालों की भीड़..
चीरती रूह..
बेबसी महकाती..
सियासी मक्कारी..!!"

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'इतराई है पुरवाई..'




"उड़ी है ग़मों की चादर..
फिर से..
छाई है खुमारी..
फिर से..
इतराई है पुरवाई..
फिर से..

दे गया हवा नासूर..
फिर से..
ना सह सकूँगा गम-ए-जुदाई..
फिर से..

आना ही होगा..
पेशानी-ए-रूह..
मेरे महबूब..
फिर से..!!"

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Saturday, October 23, 2010

'तुम्हारी कलम..'



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"बेख़ौफ़ घूमता हूँ..
कूचे पे सनम..
ना मिलो..
ना देखो..
पैगाम भेजो..
राहगीरों के संग..
अश्कों में लिपटी..
तुम्हारी मखमली चादर..
खुशबू से तरबतर..
तुम्हारी कलम..
और..
चाहत से रंगरेज़..
मेरी रूह..!!"


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'डूबना सीखा गयी..'


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"दोस्ती ईमां सिखा गयी..
डूबा था..फ़क़त..
डूबना सीखा गयी..!!"

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Wednesday, October 20, 2010

'समर्पित है जीवन..'




हमारे परम-प्रिय मित्र को समर्पित, जिन्होंने हमारे जीवन को एक नयी दिशा..पहचान दी है..!!



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"सुरभित है जीवन तुमसे..
सुरम्य है जीवन तुमसे..
सम्पूर्ण है जीवन तुमसे..
सुशोभित है जीवन तुमसे..

सलंग है मिठास तुमसे..
सदैव है मिठास तुमसे..
सुकोमल है मिठास तुमसे..
शीतल है मिठास तुमसे..

सुवर्ण है वाणी तुमसे..
सुसंस्कृत है वाणी तुमसे..
सभ्य है वाणी तुमसे..
संवरीं है वाणी तुमसे..

सानिध्य मिला है तुमसे..
संबल मिला है तुमसे..
संसार मिला है तुमसे..
सार मिला है तुमसे..

समर्पित है..
सादगी में समायी..
सु-संगती की..
सारी श्रृंखला..!!"


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'नाते..'



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"झूठे हैं नाते सारे..
बेमतलब के नारे..
अश्क..रुसवाई..
रकीब हमारे..!"

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Monday, October 18, 2010

'नादाँ तमन्ना..'


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"सुलगती सुलझने..
उलझती उलझने..

दफ्न नादाँ तमन्ना..!!"

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'ईमानदारी..'


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"मुस्कुरा सके ज़माना..
अक्स छुपाये रखा..
ईमानदारी को बहाना..
मेरा साक़ी समझा..!!"

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' कारवाँ..'


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"चला जिस मोड़..ठिकाना मिला..
कहीं हसरत..कहीं फ़साना मिला..

ना मिला..जिस उम्मीद कारवाँ खिला..!!"

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'कोई बहाना..'


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"मसरूफ है ज़माना..
ढूँढो कोई बहाना..

क्या करीब नहीं आना..!!!!"

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Sunday, October 17, 2010

'अपने..'


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"दहलीज़ ना रखना ज़माने के आगे..
सुना है..
अपने ही खंज़र छुपा लाते हैं..!!"


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'एक पुराने बक्से में..'


कुछ वर्षों पहले लिखी थी..बिना कोई संशोधन प्रेषित कर रहे हैं..



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"बचपन सहेजकर रखा था..
एक पुराने बक्से में..

कुछ खिलौनें..कुछ गुड़िया..
कोई कश्ती..कोई गदा..

कुछ तीर-कमान..कुछ आँसू की पुड़िया..
कोई ताबीज़..कोई धागा..

कुछ भूली-बिसरी यादें..
कुछ गुलमोहर के फूल..
कुछ इमली के बीज..
कुछ बगीचे की धूल..

थोड़ी मासूम-सी हाथापाई..
कुछ पुराने सिक्के..
कुछ गुड़ के चक्के..
कुछ सरसों और मक्के..

थोड़े पुराने ख़त..
कुछ तितालियों के रंग..
कुछ दरिया का पानी..
कुछ चबूतरे तंग..

कुछ खिलखिलाती तस्वीरें..
कुछ कुरते के बटन..
कुछ जूतों की तस्में..
कुछ यारों के टशन..

दीवाली की सफाई में..
सब बेच दिया है..

सुना है..

मार्केटिंग वाले..
सब एक्सेप्ट करते हैं..
इस फेस्टिव सीज़न में..!"


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Saturday, October 16, 2010

'साये..'


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"दिल की तरंगों से..
बह निकले हैं..
साज़ कई..
महफ़िल सजे..
तूफाँ उठे..
ना जलेंगे..
यादों के साये..!!"

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'जुस्तजू ..'


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"ना कहिये आप..
ना कहेंगे हम..
इसी जुस्तजू में..
निकल जाएगा दम..!"

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Saturday, October 2, 2010

'अरमां ..'



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"ए-ज़िन्दगी..
क़र्ज़ उतारने की चाहत..
हर्फ़ समेटने की राहत..

काश..
मुनासिब हो..
*कामिल हो..

ये अरमां कभी..!!"

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*कामिल = पूरा होना..!!

'फितरत..'



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"लिखता हूँ..
नाम ..
जब कभी..
ए-ज़िन्दगी..

वर्क खोलती..
हज़ार इमारतें..
नक़ाब पहने..
हर शह..
खंज़र लिए..
हर आदमी..

अजीब सलीका..
रुसवाई का..
रंगीं फितरत..
सिफ़त-ए-इन्स..!"


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*सिफ़त-ए-इन्स..= इंसान का स्वभाव/Human Characteristics..

Friday, October 1, 2010

'मेरे महबूब..'


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"राज़ खुलते रहे..शब भर..
सिलवटें बिखरी रहीं..शब भर..
दराज़ महकते रहे..शब भर..
रूह मचलती रही..शब भर..
नगमे झनकते रहे..शब भर..
नज़रें सिमटीं रहीं..शब भर..
मदहोशी बहती रही..शब भर..
आग दहकती रही..शब भर..

एहसां ता-उम्र..
वस्ल-ए-रात..

मेरे महबूब..!"

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