Wednesday, March 2, 2011

'रूह-का-इतर..'



...


"बाँध तकिये से..
रख लूंगी..
काजल के मोती..
नापोगे दरिया की गहराई..
दबे मिलेंगे..
तेरे-मेरे..
एहसास..
अरमान..
और..
रूह-का-इतर..!!"

...

8 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

Er. सत्यम शिवम said...

खुबसुरत प्रस्तुति....बहुत सुंदर..यूँही लिखते रहे....शुभकामनाएँ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर क्षणिका!
महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद सत्यम शिवम जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद मयंक साहब..!!

शिखा कौशिक said...

आपकी प्रस्तुति सराहनीय व् सुन्दर है .

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

प्रियंकाभिलाषी जी
सादर सस्नेहाभिवादन !

इतनी संक्षिप्त सुंदर रचना !
तेरे मेरे एहसास …
अरमान …
और …
रूह का इतर … !!


वाह ! गंध से इधर भी सांसें महकती महसूस होने लगी … :)
बहुत सुंदर !

♥ हार्दिक शुभकामनाएं ! मंगलकामनाएं ! ♥
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद शिखा कौशिक जी..!!

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद राजेंद्र स्वर्णकार जी..!!