Sunday, March 3, 2013

'वस्ल की तपिश..'



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"कितनी रातों से अधूरी थी..तेरी एक छुअन से नम हुई चाँदनी और सिमट गये बेशुमारे सितारे.. सिलवटें भी तरस गयीं थीं, वस्ल की तपिश के लिये..!!!"

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--ज़ालिम नज़ारे..बेचैन रातें..

1 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

Rajendra Kumar said...

सुन्दर प्रस्तुति.