Tuesday, January 28, 2014

'सव्वाली ही रहा..'











...


"कैसी तलब थी.. कुछ न समझ सका..
आवारा था..आवारा ही रहा..

हँसी-खेल में मिटाता रहा जज़्बात सारे..
तनहा था..तनहा ही रहा..

बहर..रदीफ़..मतला..
सब खफ़ा हैं..
हर शे'र अधूरा था..अधूरा ही रहा..

बेरुख़ी इक तेरी सह न सका..
जुदा हुआ कैसे तेरी रूह से..
जो हुआ जुदा..जुदा ही रहा..

उम्मीदें बेवज़ह साहिल पे तैरतीं..
गहराई नापता मैं..
नादां था..नादां ही रहा..

बेइंतिहां मोहब्बत है तुझसे..
'जां'..
सव्वाली था..सव्वाली ही रहा..

न भरना बाँहों में कभी..
बर्बाद था..बर्बाद ही रहा..!!"

...

--काश तुम सुनते..वो जो मैंने कभी कहा ही नहीं..

2 ...Kindly express ur views here/विचार प्रकट करिए..:

संजय भास्‍कर said...

एक हसीं ख्वाब की तरह खूबसूरत नज़्म।

Priyankaabhilaashi said...

धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!