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"बहुत सहमी सी हैं..आहें मेरी..
हर वक़्त उलझती हैं..राहें मेरी..१
जब भी चलता हूँ..बाँध के कफ़न..
बारहां..जकड़ लेती हैं..निगाहें मेरी..२
ना तन्हा..ना बेबस..है जुस्तजू..
फ़क़त..अरमानों से जूझती हैं..बाहें मेरी..३
थक के बैठ जाऊं..वो पत्थर नहीं..
रगों में बहती..फौलाद की फाहें मेरी..४..!"
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बहुत ही अच्छा लिखा........."
ReplyDeleteधन्यवाद अमृतघट जी..!!
ReplyDeleteफौलाद की फाहें,
ReplyDeleteवाह क्या कल्पना है
धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद वर्मा जी..!!
ReplyDeleteसहमी आहें...अरमानों से जूझना...फ़ौलाद की फ़ाहें...बहुत सुंदर उपमायें दी है.
ReplyDeleteथक के बैठ जाऊं वो पत्थर नहीं
ReplyDeleteरगों में बहती फौलाद की फाहें मेरी
वाह ....बहुत खूब ......!!
very good...........
ReplyDeleteधन्यवाद विजयप्रकाश जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद हरकीरत 'हीर' जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद गौतम सर जी..!!
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