
...
"लफ्ज़ बिखरे रहे..
अरमां सुलगते रहे..
आँसू सिमटे रहे..
खूं के कतरे जमे रहे..
कलम की स्याही भी..
सूख गयी..
ज़ख्मों को हवा दो कुछ..
नासूर झलकें..
रूह से अब..
आज फिर..
अधूरी रह गयी..
मेरी कहानी..
मेरा सामान..
सच..
लफ्ज़ बिखरे रहे..
दराज़ में..
शब भर..!"
...
वाह-वाह-वाह , क्या कहूं , बेहतरीन लगी ये रचना।
ReplyDeleteबहुत खूब । सुन्दर कविता । बधाई स्वीकारे ।
ReplyDeletebhetreen.....prastuti
ReplyDeleteवाह!! उम्दा रचना!!!
ReplyDeletesundar rachna
ReplyDeletebadhai
amazing workkkk...
ReplyDeleteधन्यवाद मिथिलेश जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद दीपायन जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद देवेश प्रताप जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद उड़न तश्तरी जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद अरशद अली जी..!
ReplyDeleteThnxx Q2..!!
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