Wednesday, April 7, 2010

'सुकून-ए-काज़ल..'

...

"रुस्वाइयां तैरती थीं..
साँसों से टकराती थीं..
राहें उलझतीं थीं..
निगाहों से शर्मातीं थीं..

खामोश है..
मंज़र सारा..


मुद्दत हुई..
आईना नहीं देखा..
सच है..
सुकून-ए-काज़ल..
नहीं देखा..!"

...

3 comments:

  1. good

    bahut khub


    shekhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

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  2. हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  3. धन्यवाद शेखर कुमावत जी..!!

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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!