ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।खूबसूरत बात।शुक्रिया।
वाह, क्या बात है
मुहब्बत से अक्स का ज़ख़्मी होना ..गज़ब की सोच ...
सही है मुहब्बत जख्म ही देती है ... छलनी कर देती है ...
waah..kya khoob keha.. ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।
बहुत खूब कहा है आपने ।
जिन्दगी की कड़ुवी सच्चाई
धन्यवाद वंदना जी..!! बहुत आभारी हूँ..!!
धन्यवाद समय जी..!!
धन्यवाद कुंवर कुसुमेश जी..!!
धन्यवाद संगीता आंटी..!!
धन्यवाद दिगंबर नास्वा जी..!!
धन्यवाद पारुल जी..!!
धन्यवाद उपेन्द्र 'उपेन' जी..!!
स्वागत है..आपके विचारों का..!!!
ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।
ReplyDeleteखूबसूरत बात।
शुक्रिया।
वाह, क्या बात है
ReplyDeleteमुहब्बत से अक्स का ज़ख़्मी होना ..गज़ब की सोच ...
ReplyDeleteसही है मुहब्बत जख्म ही देती है ... छलनी कर देती है ...
ReplyDeletewaah..kya khoob keha.. ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।
ReplyDeleteबहुत खूब कहा है आपने ।
ReplyDeleteजिन्दगी की कड़ुवी सच्चाई
ReplyDeleteधन्यवाद वंदना जी..!!
ReplyDeleteबहुत आभारी हूँ..!!
धन्यवाद समय जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद कुंवर कुसुमेश जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद संगीता आंटी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद दिगंबर नास्वा जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद पारुल जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद उपेन्द्र 'उपेन' जी..!!
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