Saturday, January 22, 2011

'रखना महफूज़..'




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"जिस्मों को कुरेदने से..
रूह छिल जाती है..
आता हूँ साहिल पे..
कश्ती मचल जाती है..
बाशिंदा हूँ..
कूचे का..
रखना महफूज़..
मोहब्बत से..
अक्स ज़ख़्मी हो जाते हैं..!!"

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14 comments:

  1. ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।
    खूबसूरत बात।

    शुक्रिया।

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  2. वाह, क्या बात है

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  3. मुहब्बत से अक्स का ज़ख़्मी होना ..गज़ब की सोच ...

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  4. सही है मुहब्बत जख्म ही देती है ... छलनी कर देती है ...

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  5. waah..kya khoob keha.. ज़िस्मों को कुरेदने से, रूह छिल जाती है।

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  6. बहुत खूब कहा है आपने ।

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  7. जिन्दगी की कड़ुवी सच्चाई

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  8. धन्यवाद वंदना जी..!!

    बहुत आभारी हूँ..!!

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  9. धन्यवाद समय जी..!!

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  10. धन्यवाद कुंवर कुसुमेश जी..!!

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  11. धन्यवाद संगीता आंटी..!!

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  12. धन्यवाद दिगंबर नास्वा जी..!!

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  13. धन्यवाद पारुल जी..!!

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  14. धन्यवाद उपेन्द्र 'उपेन' जी..!!

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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!