
...
"इश्क-ए-गुबार..जाने ना महबूब..
जिस रोज़ भूले क़यामत हुई..१..
बसे हो रूह में बन के धड़कन..
जिस रोज़ खिले नजाकत हुई..२..
आलम-ए-तन्हाई क्या जाने रकीब..
जिस रोज़ धूले बगावत हुई..३..
गम की आँधी चलती है तेज़ बहुत..
जिस रोज़ *जिले शरारत हुई..४..
दिखा दूं हूनर ना घबराना..वाईज़..
जिस रोज़ मिले हिमाकत हुई..५..!!"
...
*जिले = जले
सार्थक लेखन .आभार
ReplyDeleteslut walk
धन्यवाद शिखा कौशिक जी..!!!
ReplyDeleteबसे हो रूह में बन के धडकन
ReplyDeleteजिस रोज खिले नजाकत हुई ....कितनी कोमलता है तुम्हारे इस शेर में ............वाह!!
गम की आंधी चलती है तेज बहुत
जिस रोज जिले शरारत हुई ...यह भी अच्छा लगा .
वाह!
ReplyDeleteआपको पढ़ने का अलग ही आनंद है।
सादर
धन्यवाद दी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत माथुर जी..!!
ReplyDeleteसुन्दर और सार्थक रचना...
ReplyDeleteआपका लिखने का एक अलग ही अंदाज़ है... जो आपको सबसे अलग कर देता है... बहुत ही सुन्दर...
ReplyDeletebest
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