Monday, September 24, 2012

'वजूद-ए-लहर..'



...

"काश..
बँध सकते..
रेत पे साहिल के घरोंदे..

पड़ता है टूटना..
हर पल..

फ़क़त..
बचाने..
वजूद-ए-लहर..!!"

...

3 comments:

  1. धन्यवाद राजेश कुमारी जी..!!

    आभारी हूँ..!!

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  2. धन्यवाद मृदुला प्रधान जी..!!

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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!