
...
"किरच-किरच टपकती रही..
हर्फ़ से सनी धूप..
तुम सब जानते थे..
मेरा खालीपन..
मेरी वहशत का जिस्म..
क्यूँ बुलाते थे उँगलियों की घुटन को..
इतने करीब कि फिसल जाती थी..
मेरी बेबसी उन पन्नों पर..
बमुश्किल समेटा था..
उस रोज़..
स्याह शाम का अल्हड़ मंज़र..
तेरी छुअन..
मेरी रूह..
और..
इक शब..
वहशत की..
याद रखोगे ना..
मेरी इबादत..
मोहब्बत की..!!"
...
बेहतरीन ।
ReplyDeleteअहा...बहुत सुन्दर!!!
ReplyDeleteअनु
धन्यवाद संगीता आंटी..
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ReplyDeleteधन्यवाद ब्लॉग बुलेटिन जी..
आभारी हूँ..
धन्यवाद अनु जी..!!
ReplyDeleteलाजवाब!!!
ReplyDeleteकभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
Tamasha-E-Zindagi
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वो वहशत भरी इक शब् ही होती ही जो किताब भर जाती है मुहब्बत की ...
ReplyDeleteलाजवाब ...
धन्यवाद दिव्या शुक्ला जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद दिगम्बर नासवा जी..!!
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ReplyDeleteबहुत खूबसूरत
डैश बोर्ड पर पाता हूँ आपकी रचना, अनुशरण कर ब्लॉग को
अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
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बेहतरीन
ReplyDeleteधन्यवाद दर्शन जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद तुषार राज रस्तोगी जी..!!
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