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"तुम मेरी ज़िन्दगी का नहीं..मेरा एक अटूट हिस्सा बन चुके हो.. हर नफ्ज़ मुझमें शामिल रहते हो..कहीं भी जाऊँ, साँसें महकाते हो..कितने ही गहरे हों स्याह रात के साये, अपनी बाँहों में छुपा दर्द पिघला देते हो..!!!
आओ, उड़ जाते हैं भुला दुनिया..रवायत.. महसूस करते हैं लकीरों की चाहत..!!"
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बहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत जी..
ReplyDeleteसादर आभार..!!
सुन्दर अभिव्यक्ति
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