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"खुद ना कर पाए..दूसरों से उलझते हैं..
जाने किस कश्ती की..राह में उछलते हैं..१
चाँदनी के प्याले से झाँकते रहे..लम्हे..
यादों से लड़ते हुए..आँख में मचलते हैं..२
सुराही रंगों में डूबी..रखी थी सिरहाने..
बेवज़ह..जवां लफ़्ज़ों से चादर बदलते हैं..३
गुज़ारिश माज़ी की..बारिश में आफ़ताब..
अजीब फ़रमान..आह..रूह से फिसलते हैं..४..!"
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बढ़िया रचना..नये साल की हार्दिक शुभकामनाएँ!!!
ReplyDeleteबहुत बढ़िया!!
ReplyDeleteवर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाने का संकल्प लें और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।
- यही हिंदी चिट्ठाजगत और हिन्दी की सच्ची सेवा है।-
नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ!
समीर लाल
उड़न तश्तरी
कल 27/10/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
ReplyDeleteधन्यवाद!
धन्यवाद विनोद कुमार पाण्डेय जी..
ReplyDeleteइतनी देरी के लिए बहुत बड़ी वाली क्षमा चाहती हूँ..
धन्यवाद उड़न तश्तरी समीर साब..!!
ReplyDeleteदेरी के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ..
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत जी..
सादर आभार..इतनी पुरानी रचना को सबके समक्ष लाने का बहुत-बहुत धन्यवाद..!!
bahut achha likha hai .. mujhe apna ek purana essay yaad aa gaya
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ReplyDeleteबहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति......
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