
...
"अफ़साने इन दिनों..
मुस्कुराते हैं..
ख्वाब इन दिनों..
चहचाहते हैं..
साहिल इन दिनों..
फुसफुसाते हैं..
परिंदें इन दिनों..
लह्काते हैं..
शायर इन दिनों..
शरमाते हैं..
मौसम इन दिनों..
बुदबुदाते हैं..
रकीब इन दिनों..
कतराते हैं..
नक़ाब इन दिनों..
उलझाते हैं..
मयखाने इन दिनों..
समझाते हैं..
ज़ख्म इन दिनों..
गुदगुदाते हैं..
वाईज़ इन दिनों..
छलकाते हैं..
नज़ारे इन दिनों..
टकराते हैं..
मुद्दत से..
मुरीद हूँ..
फ़क़त..
तुझमें..
बिखरना..
चाहता हूँ..!"
...
बहुत ही बढिया रचना लगी, लेकिन किन दिंनो ।
ReplyDeleteवाह क्या खूब फरमाते है .
ReplyDeleteधन्यवाद मिथिलेश जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद शरद जी..!!
ReplyDeleteवाह बहुत खूब लिखा है !!
ReplyDeleteधन्यवाद कुसुम जी..!!
ReplyDeleteबस आपका मार्ग-दर्शन मिलता रहे..इसी आशा में...!!