Thursday, March 18, 2010

'जज़्बात..'



...

"नरम सफहों की..
बाँध गठरी..
रूह को तराशा फिर..

गुलों की महक..
इत्र हो जाती है..

बेजुबान अल्फाज़..
जज़्बात कई मर्तबा..
सुना जाते हैं..

रौशनी-ए-माहताब..
लूटा आई..
सुकूँ फिर..!!"

...

13 comments:

  1. गुलो की महक
    इत्र हो जाती है

    खुश्बू है इस पोस्ट में

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  3. बेहतरीन प्रस्तुति ...

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  4. सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभकामनायें

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  5. धन्यवाद ranivishal जी..!!

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  6. धन्यवाद उड़न तश्तरी जी..!!

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  7. धन्यवाद वर्मा जी..!!

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  8. धन्यवाद देवेश प्रताप जी..!!

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  9. धन्यवाद निर्मला कपिल जी..!!

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