Saturday, April 24, 2010

'नाम..'


...


"अजनबी मिले बेशुमार..
सफ़र-ए-दरिया-ए-ज़िन्दगानी..
चिरांगा हुए..
रूह से रूबरू..
बिखरी झोली में
मसर्रत-ए-'प्रियंकाभिलाषी'..

नज़राना-ए-अक़ीदत..
सज़ा रखा है..
आईने में..
ए-हम-ज़लीस..

देहलीज़-ए-कूचा..
कसौटी-ए-शाम..
नाक्शीन होगा..
फ़क़त मेरा नाम..!"

...


*मसर्रत = Happiness..
अकीदत = Affection..

3 comments:

  1. बेहतरीन पंक्तियां।

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  2. धन्यवाद संसद जी...!!

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  3. हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

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