प्रियंकाभिलाषी..
Tuesday, April 20, 2010
'लकीरें..'
...
"रश्क-ए-तन्हाई..
तंग है..
अरमानों से हुई..
जंग है..
शिकवा-ए-सुकून..
दंग है..
मंज़र-ए-जिंदगी..
रंग है..
फासिलों..
अब तो यकीं मानो..
लकीरों में..
बस..खुदा जानो..!"
...
*लकीरों = हाथों की लकीरें..
1 comment:
priyankaabhilaashi
April 21, 2010 at 7:47 AM
धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
Reply
Delete
Replies
Reply
Add comment
Load more...
स्वागत है..आपके विचारों का..!!!
‹
›
Home
View web version
धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDelete