Tuesday, April 20, 2010

'लकीरें..'



...

"रश्क-ए-तन्हाई..
तंग है..
अरमानों से हुई..
जंग है..
शिकवा-ए-सुकून..
दंग है..
मंज़र-ए-जिंदगी..
रंग है..

फासिलों..
अब तो यकीं मानो..
लकीरों में..
बस..खुदा जानो..!"

...

*लकीरों = हाथों की लकीरें..

1 comment:

  1. धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!

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