
...
"लिपट कर..
रोई बहुत..
गर्द से ढकी..
जुस्तजू से महकी..
दास्तान-ए-मोहब्बत..
गलीचा-ए-गुल..
नम हुआ..
गम-ए-शहनाई..
बाँह फैलाती..
तेरी और मेरी..
तस्सवुर की..
बहती हुई..
अरमानों की..
रूह में पनपती..
जिस्म में सुलगती..
तूफानी मंज़र..
आवारा..
मदमस्त..
मयकशी..
'शब'..!!"
...
सुंदर, सटीक और सधी हुई।
ReplyDeleteबहुत सुन्दर!! आपकी रचनायें अच्छी होती हैं हमेशा ही!!
ReplyDeleteधन्यवाद उड़न तश्तरी जी..!!
ReplyDeleteShubhan Allah ..!
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