
...
"आँगन में अलसायी..
खनखनाती कनक..
भेदती समय-चक्र..
हौसले की खनक..
ह्रदय-ताल में गहराई..
इंसानियत की जनक..
कब तक जलाएगी..
यह राजनीति की भनक..
संगठित संपदा करती कमाल..
यहाँ-वहाँ फैली चनक..
उठो..
उठो..
ए-भारतवासी..
सुनो..
भारत माँ की पुकार..
मिटा मन के विषण..
खोलो राह एक नयी..
दीप जलाओ खुशियों के..
बहाओ धारा एक नयी..
उठो..
उठो..!!"
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ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.
ReplyDeletesundar aahvahan
ReplyDeleteधन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद माधव जी..!!!
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