
...
"राज़ खुलते रहे..शब भर..
सिलवटें बिखरी रहीं..शब भर..
दराज़ महकते रहे..शब भर..
रूह मचलती रही..शब भर..
नगमे झनकते रहे..शब भर..
नज़रें सिमटीं रहीं..शब भर..
मदहोशी बहती रही..शब भर..
आग दहकती रही..शब भर..
एहसां ता-उम्र..
वस्ल-ए-रात..
मेरे महबूब..!"
...
बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में
ReplyDeleteधन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDeletebahut khoob
ReplyDeleteaap ki urdu gazab hai
धन्यवाद अपूर्ण जी.!!
ReplyDelete