Saturday, November 13, 2010

'रूहानी रूह..'


...


"एक जाल बुना था..
इर्द-गिर्द..
कुछ रूहानी रूह..
कूचा बसा गए..
जाम-ए-सुकूत..
छलका गए..
गहरा गए हो..
ज़मीं के आसमां पे..
फ़क़त..
भूला गए..
वजूद..!!"


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8 comments:

  1. सुंदर भावाव्यक्ति अच्छी लगी

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  2. भूला गये
    वजूद

    बेहतरीन पक्तिया है

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  3. जमीँ के आसमां पर
    भुला गये वज़ूद
    सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभकामनायें।

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  4. अपके दूसरे ब्लाग पर कमेन्ट नही पोस्ट हो पा रहा। शायद आपने वर्ड वेरिफिकेशन लगा रखी है।

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  5. धन्यवाद दीपक सैनी जी..!!

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  6. धन्यवाद निर्मला कपिला जी..!!

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  7. सुन्दर अभिव्यक्ति। शुभकामनायें।

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  8. धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!!

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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!