Wednesday, November 10, 2010

'सूनापन..'


...


"नशे में गुज़रती रही शब..
लफ्ज़ उलझते रहे..
यादों की आहें..
वादियों की ज़ुबानी..
भूला सकूँगा क्या कभी..
इठलाती निगाहों का सूनापन..!!"


...

3 comments:

  1. कितनी देर कमेन्ट बाक्स ढूँढती रही। सुन्दर रचना गागर मे सागर । चंद लम्हें भी कई बार पूरे जीवन पर छा जाते हं। शुभकामनायें।

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  2. बहुत ही सशक्त भावपूर्ण और सुंदर...

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  3. धन्यवाद निर्मला कपिला जी..!!

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