
...
"दूर हवा के झोंके से..
मचल जाता हूँ..
जीवन के हलके स्पर्श से..
संभल जाता हूँ..
जल की निर्मल बूँद से..
निखर जाता हूँ..
दिनकर की पहली किरण से..
चहक जाता हूँ..
चन्द्रमा की शीतल चाँदनी से..
महक जाता हूँ..
गहराई से गहरी है..
कुदरत की जादुई छड़ी..
'पाषाण-ह्रदय' सींच..
बनाया करुणा की लड़ी..!!"
...
जादुई छड़ी और करुणा की लड़ी का जवाब नही है!
ReplyDeleteबहुत सुन्दर रचना है!
.बहुत खूबसूरत अहसास है.
ReplyDeleteसच मे उस प्रभु की मया भी अद्भुत है। एक तिनके का भी सृजन कैसे करता है। सुन्दर एहसास । बधाई।
ReplyDeleteधन्यवाद मयंक साहब..!!
ReplyDeleteधन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDelete