Monday, February 14, 2011

''ज़ख्मों की दरियादिली..'



...


"ज़ख्मों की दरियादिली..
थाम के..
चंद लम्हे..

मोहब्बत की चाशनी..
लगा रही हो..
नश्तर की कलछी से..


खुशियों की कड़ाई..
समेट सके..
जिस्मों के फेरे..
गर..

रूह की परतें खुलें..!!"


...

4 comments:

  1. वाह !
    इस कविता का तो जवाब नहीं !

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  2. धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!

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  3. खुदा उस डूबने वाले की हिम्मत को जवां रखे, की साहिल के क़रीब आकर उसे साहिल नहीं मिलता|

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  4. धन्यवाद दिवाकर गर्ग जी..!!

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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!