
...
"जीवन की सरगम..
चमक खो रहीं हैं..
स्वयं का प्रतिबिम्ब..
सुगंध बेच रहा है..
तनिक..
समीप बैठ..
ह्रदय-चाप सुनो..
घायल सैनिक-सा..
मनोबल हो रहा है..
दुर्लभ संबल..
मापदंड बुझा रहा है..
एकाकी का बाण..
लहूलुहान कर रहा है..
वाणी से निर्बलता..
मिटा जाओ..
सींच दो..
अंतर्मन का उपवन..
ए-मित्र..
अचूक उपचार है..
स्पर्श तुम्हारा..!!"
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jakhmi sainik sa .......bahut sundar bhav achhi soch ka udaharan ,aabhar
ReplyDeletekhoobsurat...bhawpurn...
ReplyDeletebadiya ahsas!
ReplyDeleteखूबसूरत एहसास। बधाई।
ReplyDeleteधन्यवाद सुनील कुमार जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद कविता रावत जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद निर्मला कपिला जी..!!
ReplyDeleteआपके विचार भी अचूक उपचार एक मित्र के स्पर्च की तरह|
ReplyDeleteधन्यवाद दिवाकर गर्ग जी..!!
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