प्रियंकाभिलाषी..
Friday, May 6, 2011
'ज़मीन-ए-ख्वाब..'
...
"क्या दोस्ती..
क्या नज़राना..
वक़्त की शाख..
उम्र भर का अफसाना..
बदल गया मिजाज़..
खुला जब मयखाना..
ज़मीन-ए-ख्वाब..
क्या जाने इतराना..
फ़क़त..वाज़ीब है..
यादों का शरमाना..!!!"
...
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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!
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