
...
"सुना था..
निशां पैरों के..
मिटते नहीं..
मंज़र रूह के..
सुलगते नहीं..
किस्से मोहब्बत के..
बदलते नहीं..
कुछ रोज़ हुए..
मेरे आँगन..
तारे टिमटिमाते नहीं..
आफ़ताब लुटाता नहीं..
अपनी हंसी..
माफ़ी की अर्जी..
लगा आई हूँ...
फ़क़त..
आज फिर..
ज़मीर अपना..
दफ़ना आई हूँ..!!!"
...
बेहतरीन अंदाज में सुन्दर रचना .
ReplyDeleteपसंद आया यह अंदाज़ ए बयान आपका. बहुत गहरी सोंच है
ReplyDeleteधन्यवाद अमृता तन्मय जी..!!!
ReplyDeletehamesha ki tarah super...
ReplyDeleteअच्छा है ...ज़मीर को दफना दिया...अपनों को जाने नहीं देना चाहिए...माफ़ी मांग के मना लेना चाहिए
ReplyDeletesunder...
ReplyDeleteसुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ
ReplyDeleteधन्यवाद sm जी..!!
ReplyDeleteबहुत बढिया प्रस्तुति
ReplyDeleteबेहतरीन अंदाज में सुन्दर रचना .
ReplyDeleteआपको मेरी हार्दिक शुभकामनायें.
लिकं हैhttp://sarapyar.blogspot.com/
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धन्यवाद नीरज जाट जी..!!!
ReplyDeleteधन्यवाद vidhya जी..!!!
ReplyDeleteधन्यवाद दिलबाग विर्क जी..!!!
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