
...
"व्यर्थ लुटाता रहा..
जीवन की धार..
लक्ष्य समीप..
ह्रदय के हार..
क्यूँ विचलित हुए..
गुण-रुपी श्रृंगार..
परिभाषा सरल..
दुर्लभ हैं संस्कार..
चहुँ ओर विचर..
ना मिले सत्कार..
चिंतन-मनन दिखलाए..
संयम सुसंस्कृत आधार..
किया जिसने ग्रहण..
हुआ भवसागर पार..!!"
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bahut hi achhi rachna
ReplyDeleteभावों की सुंदर अभिव्यक्ति........
ReplyDeleteबेहतरीन।
ReplyDelete----
कल 23/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.
ReplyDeleteबेहतरीन अभिव्यक्ति.अच्छी लगी कविता.
ReplyDeleteयह भव सागर पार करने के लिए ही तो सारा उपक्रम है...अच्छा लिखा है,प्रियंका .
ReplyDeleteधन्यवाद रश्मि प्रभा जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद सुनील कुमार जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत माथुर जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद शिखा वार्ष्णेय जी..!!!
ReplyDeleteधन्यवाद दी..!!
ReplyDeleteभावों की सुंदर अभिव्यक्ति........
ReplyDeleteधन्यवाद महेश्वरी कनेरी जी..!!
ReplyDeleteभावमय करते शब्दों के साथ बेहतरीन अभिव्यक्ति ।
ReplyDeletesundar rachna
ReplyDeleteसुन्दर भावाभिव्यक्ति ...
ReplyDeleteबहुत सुन्दर भाव ...
ReplyDeleteअति सुन्दर....
ReplyDeleteधन्यवाद सदा जी..!!!
ReplyDeleteधन्यवाद kanu जी..!!!
ReplyDeleteधन्यवाद रेखा जी..!!!
ReplyDeleteधन्यवाद संगीता आंटी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद सुषमा 'आहुति' जी..!!!
ReplyDeleteबहुत पसंद आई..बढ़िया.
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