
...
"गुज़रतीं हैं साँसें..
यादों के गलियारे से..
जब कभी..
वफ़ा के साये..
झाँकते हुये..
छू जाते हैं..
अफ़साने कई..
वक़्त के पहिये..
लगाते हैं..
यकीं के तम्बू..
इठलाती पुरवाई..
लूटाती है..
साज़ कई..
ना सज़ा मिले..
मोहब्बत की कभी..
कुछ अल्फ़ाज़ यूँ भी..
नज़र-ए-महताब..
कूचा-ए-यार..!!"
...
दिल को छूती पंक्तिया..
ReplyDeleteBahut Sundar....
ReplyDeletewww.poeticprakash.com
वाह! बहुत उम्दा....
ReplyDeleteसादर...
उम्दा
ReplyDeleteखुदा करे ...ये यकीन के तम्बू....यूँ ही खड़े रहे...हमेशा !!
ReplyDeletebahut hi shandar parstuti....
ReplyDeletejai hind jai bharat
यादों के गलियारे से बहुत उम्दा रचना निकली है.
ReplyDeleteबहुत बधाई इस सुंदर अभिव्यक्ति के लिये.
बहुत हि उम्दा रचना|
ReplyDeleteधन्यवाद प्रकाश जैन जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद संजय मिश्रा 'हबीब' जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद रचना दीक्षित जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद चन्दन जी..!!
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