
...
"बर्बादी का सबब..
साथ लाया हूँ..
जिस्मों को तौलने..
रूह का काँटा लाया हूँ..
तुम्हारा आसमां थोड़ा फीका है..
मेरी ज़मीं थोड़ी गमगीं है..
आओ..
ज़रा बैठ हिसाब लगायें..
क्या खोया..
क्या पाया..
कुछ कदीम जज़्बात..
कुछ सुलगते अरमान..
और..
कुछ तेज़ कदम..
मेरी रूह-से-तुम्हारी रूह तक..!!!"
...
behtreen lekhan ka aandaaj....
ReplyDeletebahut khub..
jai hind jai bharat
वाह!
ReplyDeleteवाह,क्या बात है,
ReplyDeleteरूह से रूह तक पहुंचना हो तो वहाँ कैसा हिसाब किताब...कौन सा खोना -पाना ???...लिखा अच्छा है ...सबसे खूबसूरत लाइन है..... "जिस्मों को तौलने रूह का काँटा लाया हूँ "
ReplyDeleteबहुत खूबसूरत ..
ReplyDeleteएहसास का सफ़र पर हिसाब-किताब से परे होता है न !
wah !!!
ReplyDeleteHisab lagane wali baat behad pasand aayi...
www.poeticprakash.com
बहुत सुन्दर
ReplyDeleteखोया पाया का हिसाब लगाने में ज़िन्दगी के अनमोल दिन न गवाएं जाएँ
ReplyDeleteधन्यवाद सजन अवारा जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत माथुर जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद प्रकाश जैन जी..!!
ReplyDelete