Sunday, April 8, 2012

'रिवायती-जंग..'

समर्पित है एक सुंदर, सरल, पावन ह्रदय के स्वामी को..जिन्होंने हर क्षण मेरा साथ दिया, जब सारी दुनिया उधेड़बुन में थी..क्या होगा मेरा..!!!! आभारी हूँ..जीवनपर्यंत रहूँगी..


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"कितने रास्ते होकर गुज़रते थे हर शाम..
कितनी हसरतें मचलतीं थीं..उस चौबारे..
कितने दरख्त ढूँढ़ते थे..पोरों में नमी..
कितनी रातें पाती थीं अपनी पहचां..
कितने सपने हिलौरे मारते थे..

सब हैरां..परेशां..
कर पाऊँगी गुज़र-बसर..
दो जिस्मों की रिवायती-जंग में..!!!"

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