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"प्रिये,
जाते-जाते इक बहुमूल्य उपहार रख जा रहा हूँ..
बिछौने के नज़दीक दराज़ में..
विगत वर्षों के..
स्नेह-मिलाप के रस से सरोबार..
माधुर्य की चादर ओढ़े..
प्रेम-पत्र..
देखो, तनिक भी सिलवट न आये..
सम्बन्ध-विच्छेद में..
अक्सर..
गुड़-सी मीठी स्मृतियाँ..
अंतर्मन की दीवारें खट्टी कर जाती हैं.!!!"
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बहुत खूब
ReplyDeleteफिर सम्बन्ध विच्छेद ही क्यों
बहुत सुन्दर
ReplyDeletebahut badhia
ReplyDeleteबीते हुए सुख की स्मृतियाँ भी दुःख ही देती हैं
ReplyDeleteधन्यवाद एम वर्मा जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद रश्मि प्रभा जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद राजेश कुमारी जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद कमल कुमार सिंह(नारद) जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद चिराग जोशी जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद दी..!!
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