...
"सुनो..
कल रात भी तुम पीकर आये थे..
उलटा-सीधा कहते रहे..
बहुत समझाया..
पर..
पर..
तुम कब समझते हो..
झूठ-सच करते-करते..
अब फरेब ना टिक सकेगा..
हर साँस की भी अपनी मर्यादा होती है..
जीवन की त्रासदी..
अंतर्मन का बिछोह..
बहुत सालता है..
जिसका अनुभव तुम कर पाओ...
ये संभव ही नहीं..!!!"
...
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