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"बहुत कोशिश करी..ना रिसे तुम्हारी यादों की चाशनी.. पर, कौन रुका है... नहीं जानती मैं कौन हूँ..नहीं मानती मैं इस दुनिया की झूठी रिवायतें...नहीं जतलाना चाहती जो है नहीं मौजूद...फिर क्यूँ तुम समझते नहीं, मेरी बेचैनी..??? रात भर तड़पती हूँ बाँहों में तुम्हारी सो जाने को..पर...मेरी तड़प बस मेरी ही है..!!!! है ना..?? बिलकुल मेरी तन्हाई जैसी..!!"
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---तड़पती रूह के वारिस--चंद हर्फ़...शब भर फर्श पर बिखरे रहे..
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