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"ना जाने कब से तड़प रही थी..तेरी आवाज़ सुनने को.. अटके हर्फ़..तंग साँसें..उँगलियाँ जम गयीं हों जैसे..सब कुछ बर्बाद..बिन तेरे--कुछ नहीं कामिल..!!!!
तलाशो ऐसा दरबार, जहाँ फैसला हो..दूरियां मिट गुल खिलें..हक़ में आये मिलन की रात..!!"
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--बातें बेवज़ह..
कमाल की प्रस्तुति ....जितनी तारीफ़ करो मुझे तो कम ही लगेगी !
ReplyDeleteआज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)
ReplyDeleteधन्यवाद संजय भास्कर अहर्निश जी..!!
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