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"रूह मर गयी, आज फिर..चिल्ला-चिल्ला थक गयी आवाज़ की गलियाँ भी.. लफ्ज़ जम गये..दो पल के लिये साँसें थम गयीं.. इक शख्स की खातिर कितना कुछ जी गयी, कितना कुछ मर गया.. पी आई लाखों समंदर, फिर भी दरिया प्यासा रह गया..!!
क्या किया तूने, लज्ज़त टूट-टूट रोने लगी..दहाड़ रहीं हैं खामोशियाँ, बेज़ुबां निगाहें.. बेरहम..बेवफ़ा तन्हाई..इक तू ही मेरी अपनी..तेरे पहलू में बेशुमार आँसू दफ़्न हुए होंगे.. तपने दे आँच पे उसकी, मेरी आहें.. सुलगने दे लकीरों के रेले, मिट जाने दे रूमानी फेरे..!!!"
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---कभी-कभी अजनबी बन जाते हैं खुद से मिलने के सबब.. एक सलाम उनके नाम..
आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 06/02/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!
ReplyDeleteबहुत खूब !
ReplyDeleteकौन करेगा नमक का हक़ अदा - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !
बहुत खूब लिखा है..
ReplyDeleteकाव्यात्मक भाव ... सुंदर
ReplyDeleteबहुत ही बढ़िया
ReplyDeleteसादर
धन्यवाद यशोदा अग्रवाल जी..!!
ReplyDeleteसादर आभार..
धन्यवाद शिवम मिश्रा जी..!!
ReplyDeleteसादर आभार..
धन्यवाद रश्मि शर्मा जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद संगीता आंटी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत माथुर जी.!!
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