
...
"दफ़अतन तुम्हारे ज़ेहन से कैसे उतर गयी..गिर बाँहों से गर्द हो गयी.. क्या गुनाह हुआ..कहाँ छूटी तपिश.. तड़पती रातें..फफकती साँसें..बेआबरू रूह..!!!
एक रत्ती मिट्टी..एक गज़ सूत.. ज़िंदा जिस्म..बेबस हसरत..अदद अश्क..बोझिल आँखें.."
...
---तेरे बिन थक गयीं हैं आहें..
जिन्दा जिस्म या जिन्दा लाश ... समय के गर्भ में ...
ReplyDeleteधन्यवाद दिगम्बर नासवा जी..!!
ReplyDelete