
...
"अच्छा किया जो चले गये..
शर्मिन्दा होते हर तक़रीर..१..
क्या टुकड़े-टुकड़े जोड़ता हूँ हर्फ़..
ख़ुदको समझता बहुत अमीर..२..
लानत है बेखुदी पर जो न पहचाने..
अपनी औकात में लिपटी ताबीर..३..
चल बाँट ले रस्ते अपने-अपने..
रख लेना तू मेरी तकदीर..४..
न आऊँगा लौट के फिर..पहन..
कोई भी झूठी तस्वीर..५..
रख हौंसला,,कहता ख़ुद से..
बढ़ते रहना..ले ये जागीर..६..!!!"
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--कोई रूल बाँध सकता नहीं उलझी तारों के बेनक़ाब कोनों को..
आपकी यह पोस्ट आज के (२२ जून, २०१३, शनिवार ) ब्लॉग बुलेटिन - मस्तिष्क के लिए हानि पहुचाने वाली आदतें पर प्रस्तुत की जा रही है | बधाई
ReplyDeleteधन्यवाद तुषार राज रस्तोगी जी..!!
ReplyDeleteआभारी हूँ..
धन्यवाद रजनीश के झा जी..!!
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुतिकरण,आभार।
ReplyDeleteआपने लिखा....हमने पढ़ा
ReplyDeleteऔर लोग भी पढ़ें;
इसलिए कल 23/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
धन्यवाद!
सुंदर और बढ़िया
ReplyDeletebehtreen.
ReplyDeleteबहुत सुन्दर अभिवयक्ति .
ReplyDeleteबहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुतिकरण,
ReplyDeleteधन्यवाद राजेंद्र कुमार जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद यशवंत माथुर जी..!!
ReplyDeleteदेरी के लिए क्षमा, हार्दिक आभार..!!
धन्यवाद अशोक जी..!!
ReplyDeleteधनयवाद धीरेन्द्र अस्थाना जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद मदन मोहन सक्सेना जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद दर्शन जी..!!
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