
...
"बारिश की ज़ालिम बूंदों से..
जिस्म सहलाते हो..
अल्हड़ सुबह पर सुरूर..
जाने कैसे चढ़ाते हो..
तल्ख़ धूप की सरसराहट..
फ़क़त रूमानी बनाते हो..
भीगी शाम और आवारगी..
बेशुमार रंग सजाते हो..
शब..महबूब..लब-ए-शीरीन..
क्यूँ..हसीं कहर ढाते हो..
ख़त्म करो मौसम-ए-हिजरां..
बोलो..'डेट' पर कहाँ बुलाते हो..!!"
...
---आँठवी बारिश..
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