
...
"क्यूँ ख़्यालों में आते हो..
जानते हो आवारा हूँ..
क्यूँ प्यार बढ़ाते हो..
जानते हो ख़ानाबदोश हूँ..
क्यूँ पाबंदी हटाते हो..
जानते हो बदनाम हूँ..
क्यूँ दांव लगाते हो..
जानते हो नाकाम हूँ..
चले जाओ..
क्यूँ वक़्त लुटाते हो..
जानते हो गुमनाम हूँ..!!"
...
--यूँ ही..कभी-कभी..
Well written!
ReplyDeleteBeautiful.
Regards, Shaifali
http://guptashaifali.blogspot.com
तभी तो मन कहता है ...."कुछ बात तो है"....बहुत ही अच्छी लगी मुझे रचना
ReplyDeleteशुभकामनायें !
धन्यवाद शैफाली जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDelete