Wednesday, August 28, 2013

'मंजिल..'






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"कभी-कभी बहुत लम्बी हो जातीं हैं राहें..मंजिल बारहां रूह से टंगी रहती है..!!"

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--काश तुम समझते उलझनों की उलझन..

8 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज बृहस्पतिवार (29-08-2013) को कृष्णमयी चर्चा ( चर्चा - 1352 )
    में "मयंक का कोना"
    पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. धन्यवाद मयंक साब..

    आभारी हूँ..

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  3. उलझनों की उलझन जो न समझे उसकी उलझन कभी न सुलझे ...

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  4. बेहतरीन अंदाज़.....

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  5. धन्यवाद मदन मोहन सक्सेना जी..!!

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  6. धन्यवाद डॉ. शर्मा जी..!!

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  7. धन्यवाद दिगम्बर नासवा जी..!!

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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!