Wednesday, October 9, 2013

'जिस्मों की रीलें..'







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"इस रूह से उठा..
उस रूह चला..
फ़ासले पाटता कैसा गिला..
जो तुम नहीं कोई ख्वाइश कहाँ..
मैं दीवाना..आवारा..
दश्तो-सहरा बिखरता रहा..
चल उठायें तम्बू की कीलें..
जाने कबसे पुकारती जिस्मों की रीलें..!!"

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4 comments:


  1. धन्यवाद यशवंत जी..!!
    सादर आभार..!! देरी के लिए क्षमा..!!

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  2. धन्यवाद ओंकार जी..!!

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  3. धन्यवाद पारुल चंद्रा जी..!!

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