
...
"जाने कितने असंतुष्ट हुए..
जाने कितने शत्रु होंगे..
सोचूँ गर सबके लिए..
पूरे न कभी स्वप्न होंगे..
इसीलिए बढ़ता गया..
थकता गया..चलता गया..
न शब्द थे..न कोई सहाय..
अपना विकास करता गया..
अधिकार मेरा है और रहेगा..
कर लेना तुम सारे जतन..
अपनी माँ का लाल हूँ..
मिट आया मैं अपने वतन..!!!"
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