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"रंग अब तक सूखे नहीं..
दो बरस से अधिक समय बीत गया..
अंतस में जमी कोमल चादर की पत्तियाँ..सींचती हैं सुबह से साँझ तक..
बल के साथ असीम उत्साह भी..
जीवन के पथ जब विस्तार माँगने लगे हैं..बिछुड़ना आवश्यक हो चला है..
समय के वेग के आगे नि:शब्द और स्तब्ध हैं सारे मौन और प्रायोगिक पारितोष..!!
समय और स्मृति..
अथाह हो तो भी क्या..
अपूर्ण होती है सुगंध..
पुष्प की पंखुड़ियों की छाया के बिना..!!"
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--शांत..निर्मल क्षण जीवन का बोध कराते हैं..
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