
...
"कितने राज़ खोलती है..
कितने समेटती है..
तुम्हारी हर बात..
जाने क्या बोलती है..
मैं सुन भी न पाऊँ..
फिर भी थामे रखती है..
उदास कहूँ या अलहड़..
कितनी अंदर झकझोरती है..
तुम क्या जानोगे..
सच ना मानोगे..
संयोग से मिलना..देखो..
आँखें कैसे पुचकारती हैं..!!"
...
बहुत खूब .जाने क्या क्या कह डाला इन चंद पंक्तियों में
ReplyDeleteआज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)
ReplyDeleteआज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया. व्यस्तता अभी बनी हुई है लेकिन मात्रा कम हो गयी है...:-)
ReplyDeleteधन्यवाद संजय भास्कर जी..!!!
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