प्रियंकाभिलाषी..
Friday, January 17, 2014
'नादां दिल..'
...
"कहीं धुआं उठता रहा..
कहीं सुलगता रहा जिस्म..
कहीं धड़कने की ख़्वाहिशें थीं..
कहीं नादां दिल..
किसे समझाता..किसे बहलाता..
दोनों अपने थे..
और..
मैं बेगाना..!!"
...
--एहसास कुछ पुराने..नए सिरे से..
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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!
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