
...
"पल वो सारे..
तैरते हैं प्यारे..
थपकी वो दुलारी..
तेरी अदा निराली..
नटखट बेटू मेरा..
लगा साँसों पे डेरा..
मस्ती भरपूर थी..
ज़िंदगी नूर थी..
तेरी ख़ामोशी सालती है..
सपना वापसी का पालती है..
क्यूँ गया वक़्त..फिर आता नहीं..
दामन-ए-उम्मीद जाता नहीं..
काश..
भर सकता तेरे लिए..
दुआओं का अंबार..
पर..
कुछ एहसासों को आराम नहीं मिलता..
सच है..
उन अपनों को..सबके आगे नाम नहीं मिलता..!!"
...
बहुत की नाज़ुक खूबसूरत से अहसास ! बहुत सुंदर !
ReplyDeleteसच है , कुछ एहसासों को आराम नहीं मिलता
ReplyDeleteधन्यवाद साधना वैद जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद सुशील कुमार जोशी जी..!!
ReplyDeleteधन्यवाद नयंक पटेल जी..!!
ReplyDelete
ReplyDeleteबिलकुल सच!! छू गयी ये रचना..
शुभकामनाएं
धन्यवाद संजय भास्कर जी..!!
ReplyDelete