प्रियंकाभिलाषी..
Tuesday, May 6, 2014
'निखर उठा हूँ, माँ..'
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"कल-कल बहता अविराम जल का विशाल गठबंधन.. यूँ डोर असंभव थी, महासागर के असीम वेग में.. तुम्हारा वात्सल्य से सराबोर स्पर्श.. और मैं निखर उठा हूँ, माँ..!!"
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स्वागत है..आपके विचारों का..!!!
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